बुधवार, 23 सितंबर 2015

कलयुग की कायदा

   कलयुग की कायदा
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"कलयुग शहर के
          स्वार्थ नगर में"
   "अन्याय गली के
              चौंथी तली में"
     "रहना सम्हल के
            अगम दलदल में"
       "उड़ते जब परिन्दे
             तकते कई दरिन्दें"
         " उजाड़ते आशियाना
                 लूट भी लेते खाना"
               "चुप रहना भी सिख
                   किसी को ना दिख"
                 "ये कलयुग की नीति
                    साथ रखना यह रीति।"

रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. +918085104647
                
          
            

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

श्रवण साहू

आज मन में बहुत ही खुशी हैं गुरूवर ईश्वर लाल साहू जी की कृपा से आज18-09-2015 को राष्ट्रीय कवि संगम मुक्ताकाशी के सान्निध्य में संस्कृति विभाग रायपूर के मंच पर वरिष्ठ कवियों के सान्निध्य में कविता पाठ करने का मौका मिला।  मैं गुरजी को कोटि-कोटि प्रणाम ज्ञापित करता हूं। 
                          -  श्रवण साहू

सोमवार, 21 सितंबर 2015

तीजा-पोरा तिहार

तीजा पोरा तिहार धीरे धीरे लकठियावत हे,
बहुरिया ले जादा मोर नतनीन हा सतावत हे।
कब आही दाई ममा हा,कब आही दाई ममा हा?
बिहनिया ले संझा, बस ईही गिना गावत हे।
संग मा पारले बिसकुट अऊ सेव केरा लाही,
दिनभर चिल्लाके हमरो मन ला ललचावत हे।
फटफटी के आगु मा बईठ के पिपीप मैं बजांहू,
रहि रहि के अपन महतारी ला जोजियावत हे।
रनिया संग घरबुंदिया बांके संग खेलबो बांटी,
कब के देखे भाई बहिनी ला बने सोरियावत हे।
बड़े ममा  घर जुरमिल जाके शक्तिमान देखबो,
अपने अपन गोठियाके  भारी बेलबेलावत हे।
छोटे ममा के कनबुच्ची खेलई ला सुरता करके,
अब मने मन नतनीन हा मोर कईसे डर्रावत हे।
छोटे ममा के सुरता करके नई जावंव ममा घर,
रोना चालू अऊ अपन महतारी ला मनावत हे।
छोटे ममा ला चेताबे मोर तीर मा झन आही,
अब मया मा महतारी, बेटी ला समझावत हे।
नई खिसयावय ममा हा तैं संसो झन कर, 
तरिया नरवाकुत झन जाबे महतारी बतावत हे।
ठंऊका बेरा मा ममा  आगे मिलगे ओकर आरो,
खुशी मा मोर नतनीन ममा ला देख लजावत हे।
तीजा पोरा तिहार धीरे धीरे लकठियावत हे,
बहुरिया ले जादा मोर नतनीन हा लुकलुकावत हे।
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रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा

बुधवार, 16 सितंबर 2015

गज़ल - श्रवण साहू

नज़र क्या पड़ी कागज़ पे,
              सोंचा कुछ खास़ लिख दूँ।
मेरे सनम् तूझे सुलताना,
            खुद को तेरा दास लिख दूँ।
ऋतु बसन्ती के वियोग में,
          पतझड़ सी लिबास़ लिख दूँ।
पल-पल,छण-छण बिताया,
          वो हर लम्हा उदास लिख दूँ।
तड़पता मैं बिन तेरे प्रियतमा,
        खुद को जिन्दा लास लिख दूँ।
कलम की टुकड़ा मैं मिट्टी की,
        तूझे आज़ाद आगास लिख दूँ।
मैं-तेरी तुम-मेरी ऐ-सनम्,
     बस इतना सा विश्वास लिख दूँ।
              
           रचना-श्रवण साहू
     गांव-बरगा जि.-बेमेतरा (छ.ग.)
       मोबा.- +918085104647
       

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

मातृभाषा हिन्दी - कुंडलियॉ

                 ।। कुंडलियॉ ।।
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सोहे मस्तक जगमग ,भारत माँ की बिन्दी
अनुपम अलौकिक सुगम,राष्ट्र भाषा हिन्दी।
राष्ट्र भाषा हिन्दी, भारत की अमिट शान,
मुस्लिम सिक्ख ईशाई, हंसतें करते गान।
देववाणी-संस्कृत तनुजा,मन सबकी मोहे,
काव्य-सागर-अलंकार, मोती सरिस सोहे।
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वर्ण-वर्ण प्रति वर्ण में, हैं अद्वितीय सी भेद,
पुराण, शास्त्र,महाकाव्य, देवनागरी से वेद।
देवनागरी से वेद, सुनत भवपार लग जाये,
नेति-नेति कह धर्मानुरागी,गुण सर्वदा गाये।
मातृभाषा गुणगान सुन तृप्त भये मम कर्ण,
सुमधुर अपरिवर्तनीय, हिन्दी की हर वर्ण।
***************३******************
तन से हम स्वतंत्र भले,वचन बन्धता खाय,
अंग्रेज़ी पराधीन बन्दे, हिन्दी बोलत लजाय।
हिन्दी बोलत लजाय,बन गये शत्रु के दास,
साहब बन गये भले, मानव बने नहि खास।
मुख से अंग्रेजी सबके,'श्रवण' कर रोये मन,
पढ़त सुनत हिन्दी जबहि,नाचत सबकै तन।
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रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.+918085104647

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

गज़ल - श्रवण साहू की कलम से

                   गज़ल

सूखे पड़ते धरातल कराते यह आभास हैं,
दुखिया धरनी भी दीर्घकालीन उपवास हैं।

पापों के बोझ सें सिसकती भुमि भारत,
खिलखिलाती मन आज कितना उदास हैं।

ये क्या? तज कर अपनें रंगीन वस्त्रों कों,
भक्तिमय जोगन सी इनकी लिबास हैं।

  आस्था विभोर मन पुकार रही नित,
आयेंगे जगदीश अवश्य यही विश्वास हैं।

आयें कोई अवतार लेके कृष्ण राम जैसे,
जन्में तुलसी नानक बस यही आस हैं।
  
           रचना - श्रवण साहू
   गांव-बरगा,जि.-बेमेतरा (छ.ग.)


गुरुवार, 3 सितंबर 2015

जन्माष्टमी कविता - by/ shravan sahu

    जन्माष्टमी प्रार्थना
                 
दुनिया के पाप मिटाय बर,
  तैं अऊ आजा पापहारी।
दूखिया के दुख हटाय बर,
  तैं अऊ आजा बनवारी।

कलपत हे तोर गौ माता हा,
  नईहे कोनो हा सुनईया।
परिया घलो ला मनखे खागे,
गईया बर नईहे गुनईया।
सुरहिन ला बंशी सुनाय बर,
  तैं अऊ आजा बंशीधारी।

जन्मे कतेक दुर्योधन दुशासन
   दुरपति के चिर हरईया।
रोवत बिलखत हे नारी बिचारी
  आंसु के नईहे पोंछईया।
अबला के लाज बचाय बर,
   तैं अऊ आजा दुखहारी।

भ्रष्टाचार बदरा बन बरसत अऊ
  महंगाई के गरेरा छावत हे।
ब्राम्हण गोप ग्वाल जम्मो झन
भारी दुख ला अब पावत हे।
बिपदा मा गोवर्धन उठाय बर,
   तैं अऊ आजा गिरधारी।

अत्याचारी कालिया नाग बने,
नर नारी ला आज सतावत हे।
साधु सज्जन ला विपत परगे,
  जेन तोरे गुन ला गावत हे।
  संताप के दही चोराय बर,
    तै अऊ आजा कन्हाई।

               रचना
            श्रवण साहू
    गांव-बरगा,जि.-बेमेतरा