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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

पूस के जड़काला

गली गली खोर खोर,बगरे हे चहूं ओर
धुंधरा हा जाड़ के गा अबड़ के छाये हे

सुरुर सुरुर धुंके,धुंकी तक बिहान ले
रोनिया तापत सरि बेरा हा पहाये हे

कटकट दांत करे,मुश्कुल बात करे
तात तात चाहा हा मन ला बड़ भाये हे

बिहना मंझान चहे,रतिहा संझान घलो
बुढ़ा जवान जमो गथरी मा लदाये हे

हाथ ला सेंके बर,जाड़ ला छेंके बर
घर के डेरवठी मा गोरसी दगाये हे

सबले सुहावन हे,पूस के गा जड़काला
कुनुन कुनुन जाड़ मन ला सुहाये हे।

रचना-  श्रवण साहू 'दुलरवा'
गांव -बरगा, जि.-बेमेतरा
मोबा.-8085104647

बुधवार, 4 नवंबर 2015

मुक्तक

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अपनों से अपने गम,छुपाया नहीं करते।
यूं रूठ कर अपनों को,पराया नही करते।
इश्क दरिया दरियों से गहरा है 'श्रवण'
छोटे दिल वाले डुबकी,लगाया नहीं करते।
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               श्रवण साहू

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

श्रवण साहू

आज मन में बहुत ही खुशी हैं गुरूवर ईश्वर लाल साहू जी की कृपा से आज18-09-2015 को राष्ट्रीय कवि संगम मुक्ताकाशी के सान्निध्य में संस्कृति विभाग रायपूर के मंच पर वरिष्ठ कवियों के सान्निध्य में कविता पाठ करने का मौका मिला।  मैं गुरजी को कोटि-कोटि प्रणाम ज्ञापित करता हूं। 
                          -  श्रवण साहू