मन बेशक़ निर्मल इरादें कितने सच्चे थे।
रो कर मात्र सब कुछ पा लेना अच्छे थे।
उम्र की मार तो रूला ही दिया 'श्रवण'
हरपल मुस्कुराते थे जब तुम बच्चे थे।
- श्रवण साहू
रविवार, 30 अगस्त 2015
बचपन- श्रवण साहू
वर्ण पिरामिड रचना - श्रवण साहू
आज "वर्ण-पिरामिड" रचना का प्रयास किया हूँ, सुधारात्मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा हैं।
****विषय- वर्षा वियोग****
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ऐ
घटा
बरस
रिमझिम
देखते राह
सबकी तू चाह
कर दे झिलमिल
तुझ बिन हैं निरस
मत हमको अब सता
हितैषी है हमारी तू जता
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रचना - श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबाईल-+918085104647
गुरुवार, 27 अगस्त 2015
छोटी सी मेरी अभिलाषा - श्रवण साहू
......अभिलाषा.......
सिमटती हुई इस दुनिया में ,
छोटी सी मेरी अभिलाषा।
सरल जीवन के श्वेत पन्नों में,
लिखुँ मानवता की परिभाषा।
✏ श्रवण साहू
जिद उनकी आदत मेरी - श्रवण साहू
श्रवण की कलम से.....
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आदत था मेरा रोज रूठ जाना,
उनकी भी जिद थी मुझे मनाना।
आदत था मेरा उनसें नजरें चुराना,
उनकी भी जिद थी बांहों में समाना।
आदत था मेरा रोज उन्हें सताना,
उनकी भी जिद थी प्यार में डुब जाना।
मोहब्बत के पथिक हम चलते गये,
रूठना मनाना मगर हरपल मुस्कुराना।
कैसी आंधी आयी अब जीवन में,
कितनी दर्द, ऐसा हो गया है फसाना।
जिद है उनकी मुझे अकेले छोड़ जाना,
आदत हो गया मेरा रोज अश्क बहाना।
- श्रवण साहू
बुधवार, 26 अगस्त 2015
राखी परब मा श्रवण साहू के गीत
राखी परब के गीत.......
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दीदी तोला झुलना झुलांव ²
आये राखी के तिहार,चले मया के बयार।
मन के हिंडोलना फंदांव²
दीदी तोला झुलना.....
१) बांध देबे बहिनी तै कलाई मा मोर राखी,
भाई बहिनी के मया के हावे येहा साखी।
बलिहारी तोर मैं जांव²
दीदी तोला झुलना.....
२) जाके ससुरार दीदी तैं मोला झन भुलाबे,
करबे झन पराया, सुख दुख ला बताबे।
आंखी ले आंसु बोहांव²
दीदी तोला झुलना.....
२) जिनगी भर दीदी तैंहा हांसत गावत रहिबे,
दुनिया भले ताना मारे सुनता गोठ कहिबे।
करबे सुमत के छांव²
दीदी तोला झुलना....
रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा(छ.ग.)
मोबा- +918085104647
heart touching poem - shravan sahu
ये कैसी मजबूरी....
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मैं लायक नही सनम संग मेरा छोड़
"वो रो कर बोली मैं मजबूर हूँ"
ये प्रेम विचित्र रोग है,रिश्ता न जोड़
"वो रो कर बोली मैं मजबूर हूँ"
हर पल दुख मिलेंगे नाता अब तोड़
"वो रो कर बोली मैं मजबूर हूँ"
चंद रोज बाद...
अश्रु बह गया मेरा, जब मैनें बोला..
रह नही सकता बिन तेरे,मुंह न मोड़
"वो रो कर बोली मैं मजबूर हूँ"
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रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.- बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.- +918085104647
मंगलवार, 25 अगस्त 2015
रक्षा बंधन पर्व पर श्रवण साहू का कविता
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अधिकार नही तुझें भैया मेरे आज राखी बंधवाने को,
मुझे तो बहना कहते तुम बाकि को जाते सताने को।
दोस्तों संग मिलके कितनों को परेशान तुम करतें हो,
घिनौंना हरकत करतें आखिर क्यों नही तुम डरतें हो।
तुम्हारे ही खातिर न जाने कितनें ही रोज ऐसे मरते हैं,
रोती बिलखती कितनें दुष्कर्मों की अग्नि में जलते हैं।
क्यों न याद करतें तुम उस वक्त अपनी इस बहना को,
भुल जाते क्यों ऐ भैया हमारे माँ-बाप की कहना को?
रक्षा सूत्र बांध पापी को क्यों रिश्ता यूं बदनाम करूं,
अपराधी हो तुम भैया मेरे,तुमसे मैं भी हरपल डरूं।
रक्षा करूंगा सबकी बहनों का गर ऐसा संकल्प करो,
हँसते बांध दुँगी राखी तुमको तुम न मुझसे ऐसे डरो।
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रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा, बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. - 8085104647