मैं खुद ,खुद में 'मै' देखा हूँ।
खुद को जलाने की 'शै' देखा हूँ।
- श्रवण
कुछ हंसी कुछ गम का पल हूं मैं
न समझ नादान बीता कल हूं मैं
सहज कैद हो जाता हूं पिजरों में
शायद दिलवालों से निर्बल हूं मैं
बनते उजड़ते हैं आशियानें अक्सर
बेअसर तन्हा शज़र अचल हूं मैं
थक जाओ ढूँढते वजह हालात की
सुलझाना मुझे उल्फतों का हल हूं मैं
अल्फाज़ों में राज शब्दों का साज
आशिकों का तराशा गज़ल हूं मैं
- श्रवण साहू
तूमसे हमारी कैसी ये दूरी हैं,
कुछ मेरी, कुछ तेरी मजबूरी हैं।
तड़पाती बहुत है इंतज़ार तेरी
अधर सा मैं, जीवन भी अधूरी हैं।
हरपल मुस्कुराओ अच्छा है पर
थोड़ा तो रूठो ये भी तो जरूरी हैं।
दस्तूर समझना गर बिछड जायें
मिलें तो समझ,उनकी ही मंजूरी हैं।
अल्फाज़ सजाना बस में नही,मगर
नाम जो आये तेरी,गज़ल पूरी हैं।
रचना-श्रवण साहू
बरगा , बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.~ 8085104647
चश्मा के करिश्मा
मजबूरी मा कोनो ता कोनो छाय बर
कोनो देखे बर,अऊ कोनो देखाय बर
लगाये हे चश्मा !!!
करिया काखरो ता कखरो सफेद
कति ला देखत हे पाबे कईसे भेद
कोनो दिल के बात ला लुकाय बर
लगाये हे चश्मा !!!
काखरो सस्ता काखरो हा माहंगा
काखरो हा निक ता काखरो भड़ंगा
कोनो अपन औकात ला बताय बर
लगाये हे चश्मा !!!
का बुड़हा,का लईका अऊ का जवान
चश्मा पहिरे हे गरीब अऊ का धनवान
कोनो आँखी ला कचरा ले बचाय बर
लगाये हे चश्मा !!!
अद्भुत हे संगवारी सुन चश्मा के कहानी
लागय हे सब चश्मा कारन आनी बानी
फेर 'श्रवण' नयन के पानी छुपाय बर
लगाय हे चश्मा !!!
रचना- श्रवण साहू
ग्रा.-बरगा,जि.-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.- +918085104647
वीर वही और धीर वही,थी वही बड़ी बलिदानी।
छोटी उम्र पर रण में जूझी थी वही स्वाभिमानी।।
उम्र में हंसी ठिठोली की खेली थी खून की होली।
ब्रिटिसों पर भारी पड़ी थी मनु बाई की टोली।।
पीठ पर पुत्र को बांध हाथ में चमकते तलवार।
गर्जना करती लक्ष्मी रन में घोड़े पर हो सवार।।
लोहा लेकर मार गिराये कितने ही दुष्ट अभिमानी।
वतन के नाम लिख दी थी जिनसे अपनी जवानी।
बता दी जिसने जन को क्रांतिकारी की परिभाषा।
जिनसे आयी थी झांसी को हक पाने की आशा।।
नारी थी नारायणी वे तो दे दी अपनी भी कुर्बानी।
हरदम वंदन हे! लक्ष्मी बाई, झांसी की महारानी।
✒श्रवण साहू
बरगा ,जि.बेमेतरा (छ.ग.)
+९१-८०८५१०४६४७
परब देवारी मनावय
घर अंगना ला,निक निक सजावय रे संगी
परब देवारी मनावय,परब देवारी मनावय
चार दिन एकतऊहा दिन देवारी ले,
उजरावय घर अंगना ला सुवारी
महतारी मन तारी पीट सुवा नाचय,
जावय घर - घर सबके दुवारी
मोहरी दफड़ा बाजे गुदुम मनला भारी भावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय
उमंग भराये आज सबो के हिरदे मा
नवा कपड़ा अऊ गहना बिसाये
धनतेरस के दिन लक्ष्मी दाई के
जूरमिल सुमर सुमर जस गाये
मंदिर मंदिर घर घर म सूरति दिया जलावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय
गऊरा चौरा मा गऊरी गऊरा के
सुग्घर मिलके बिहाव मढ़ाये
संझौती बेरा घर घर मा जाके
गऊ दाई ला खिचरी खवाये
भाईदूज भाई चारा बर मंडई मातर रचावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय।
रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा
मोबा. +918085104647