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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

चल छोड़बो किसानी


°°°°°चल छोड़बो किसानी°°°°°

चुन चुन तिनका पंछी सही
        किसान बपरा खोंदरा बनाये।
फुनगी मा चढ़ बेदरा बरोबर
           अधिकारी मन डारा हलाये।
ता बन सरिसरप नेता बैरी
         निगल चगल अंडा ला खाये।
दुख हे दुहरा तोर चिरईया
         काबर तैं सपना ला सजाये।
पानी बादर ले रखे बचाके
         अत्याचारी ले कोन बचाये।
कपटी शिकारी लालच देके
          दाना डारे तोला भरमाये।
कईसे करबे अऊ का करबे
       लगा के फांदा तोला फंसाये।
कोनो तोर हितवा नईहे रे
         तोरे मास हा जग ला भाये।
नोच नोच तोरेच देहे ला
        कौआ ले गिधवा तक खाये।
चल अब छोड़ किसानी
         शहर जाबो खाये कमाये
झन तो उकुल व्याकुल होके
       माहुर खाये, फांसी लगाये।

रचना- श्रवण साहू
ग्रा.- बरगा,जि.-बेमेतरा
मोबा.- +918085104647
        

रविवार, 27 दिसंबर 2015

Shravan sahu

    मैं खुद ,खुद में 'मै' देखा हूँ।

             खुद को जलाने की 'शै' देखा हूँ।
                           - श्रवण

सोमवार, 30 नवंबर 2015

चश्मा के करिश्मा

            चश्मा के करिश्मा
मजबूरी मा कोनो ता कोनो छाय बर
कोनो देखे बर,अऊ कोनो देखाय बर
                      लगाये हे चश्मा !!!

करिया काखरो ता कखरो सफेद
कति ला देखत हे पाबे कईसे भेद
कोनो दिल के बात ला लुकाय बर
                     लगाये हे चश्मा !!!

काखरो सस्ता काखरो हा माहंगा
काखरो हा निक ता काखरो भड़ंगा
कोनो अपन औकात ला बताय बर
                     लगाये हे चश्मा !!!

का बुड़हा,का लईका अऊ का जवान
चश्मा पहिरे हे गरीब अऊ का धनवान
कोनो आँखी ला कचरा ले बचाय बर
                     लगाये हे चश्मा !!!

अद्भुत हे संगवारी सुन चश्मा के कहानी
लागय हे सब चश्मा कारन आनी बानी
फेर 'श्रवण' नयन के पानी छुपाय बर
                         लगाय हे चश्मा !!!

रचना- श्रवण साहू
ग्रा.-बरगा,जि.-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.- +918085104647

                   

सोमवार, 23 नवंबर 2015

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई / poem by shravan sahu

वीर वही और धीर वही,थी वही बड़ी बलिदानी।
छोटी उम्र पर रण में जूझी थी वही स्वाभिमानी।।

उम्र में हंसी ठिठोली की खेली थी खून की होली।
ब्रिटिसों पर भारी पड़ी थी  मनु  बाई की टोली।।

पीठ पर पुत्र को बांध हाथ में चमकते तलवार।
गर्जना करती लक्ष्मी रन में घोड़े पर हो सवार।।

लोहा लेकर मार गिराये कितने ही दुष्ट अभिमानी।
वतन के नाम लिख दी थी जिनसे अपनी जवानी।

बता दी जिसने जन को क्रांतिकारी की परिभाषा।
जिनसे आयी थी झांसी को हक पाने की आशा।।

नारी थी नारायणी वे तो दे दी अपनी भी कुर्बानी।
हरदम वंदन हे! लक्ष्मी बाई, झांसी की महारानी।
                 
                 ✒श्रवण साहू
              बरगा ,जि.बेमेतरा (छ.ग.)
               +९१-८०८५१०४६४७


शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

परब देवारी मनावय


            परब देवारी मनावय

घर अंगना ला,निक निक सजावय रे संगी
परब देवारी मनावय,परब देवारी मनावय

चार दिन एकतऊहा दिन देवारी ले,
            उजरावय घर अंगना ला सुवारी
महतारी मन तारी पीट सुवा नाचय,
             जावय घर - घर सबके दुवारी
मोहरी दफड़ा बाजे गुदुम मनला भारी भावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय

उमंग भराये आज सबो के हिरदे मा
           नवा कपड़ा अऊ गहना बिसाये
धनतेरस के दिन लक्ष्मी दाई के
           जूरमिल सुमर सुमर जस गाये
मंदिर मंदिर घर घर म सूरति दिया जलावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय

गऊरा चौरा मा गऊरी गऊरा के
               सुग्घर मिलके बिहाव मढ़ाये
संझौती बेरा घर घर मा जाके
               गऊ दाई ला खिचरी खवाये
भाईदूज भाई चारा बर मंडई मातर रचावय
परब देवारी मनावय, परब देवारी मनावय।

रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा
मोबा. +918085104647

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

गज़ल - श्रवण साहू

                 गज़ल

सुख की चाह रख,चलते-चलते हम,
जीवन के कठिन मोड़ से निकला था।

मची थी हलचल शायद कुंडली में मेंरे,
शनि के हाथों की मरोड़ से निकला था।

आवाक सा हो गया था पूरी डगर में,
छुके गुजरी मौत ऐसे रोड से निकला था।

रोता और बिलखता रहा मैं उम्र भर,
अपनी मंजिल जो छोड़ के निकला था।

गुस्ताखी यह था मेरा सुख के खातिर,
प्रकृति के नियम को तोड़ के निकला था।
                     
                        ✏ श्रवण साहू