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अपनों से अपने गम,छुपाया नहीं करते।
यूं रूठ कर अपनों को,पराया नही करते।
इश्क दरिया दरियों से गहरा है 'श्रवण'
छोटे दिल वाले डुबकी,लगाया नहीं करते।
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श्रवण साहू
बुधवार, 4 नवंबर 2015
मुक्तक
छत्तीसगढ़ी मुक्तक
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मै छत्तीसगढ़िया अंव मोला गुमान हे।
भाखा मोर छत्तीसगढ़ी मोर पहचान हे।
करम के रोटी मेहनत के पसिया पिथंव,
किसान के बेटा अंव अतके स्वाभिमान हे।
*********श्रवण साहू **********
गीत
गीत
इंहा के माटी §§§ चन्दन हे गा
छत्तीसगढ़िन दाई ला बन्दन हे गा
१)गीत गावय कोयली तान देवय मैना-
गुरतुर गुरतुर जिंहा के बोली बैना
मंदरस कस भाखा,दुख भंजन हे गा
छत्तीसगढ़ दाई......
२)पांव मढ़ावय सुरूज भिनसरहा बेरा-
कोरा कौशल्या के अऊ शबरी के डेरा
बछर बारा घुमे जिहां,रघुनंदन हे गा
छत्तीसगढ़ दाई.......
३)महिमा बतावय जेखर डोंगरी पहारी-
रूखवा नरवा तरिया तोर करय चारी
माथ नवांवय जेला,साधु सन्तन हे गा
छत्तीसगढ़ दाई.......
रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा
मो. - +918085104647
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना
"नईहे अगोरा" - "आगे हे बेरा"
जाग जाग करमईता लाल
देख अपन महतारी के हाल
छत्तीसगढ़ महतारी रोवत हे
बीर नारायन मन ला जोहत हे
अन्याय सहत हे हमर महतारी
सुसकत बिलखत हवे बिचारी
भ्रष्टाचारी किरा चाबत हे
अत्याचारी घेंच दाबत हे
दाई के गहना ला नंगालिस
संस्कृति मा आगी लगा दिस
दाई के दुलरवा किसान घलो
रोवत हे! हवे हलाकान घलो
हमर घर मा दुसर के राज
हम भीखारी अऊ वो महराज
कपटी के होगे हवे सियानी
अऊ करत हवे मनमानी
कईसे तोला लाज नई लागय
काबर तोर नींद नई भागय
महतारी के चल छुटबो करजा
जग मा देवाबो वोला दरजा
लाल लाल लाल लाल कर देबो
कपटी के बारा हाल कर देबो
बैरी के जूरमिल काल कर देबो
लाल लाल लाल लाल कर देबो
रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा
मोबा. +918085104647
सोमवार, 2 नवंबर 2015
गज़ल
गज़ल
सितारों के बीच मैं जुगनू सा जगमगाता हूं,
ख़ता क्या सुर मिले तो यूं ही गुनगुनाता हूं।
छाले पड़े पैरों में दुनिया के भागम भागों में,
ख़ता क्या आगे नही पीछे ही चला आता हूं।
रंजोगम दुनिया में कितने ही बेवफा देखें,
खता क्या नजरों सें चुपके ही नीर बहाता हूं।
सैंकड़ों के बीच भी तन्हा सा ही रोता 'श्रवण',
खता क्या सनम की याद में ही चैंन पाता हूं।
- श्रवण साहू
बुधवार, 23 सितंबर 2015
कलयुग की कायदा
कलयुग की कायदा
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"कलयुग शहर के
स्वार्थ नगर में"
"अन्याय गली के
चौंथी तली में"
"रहना सम्हल के
अगम दलदल में"
"उड़ते जब परिन्दे
तकते कई दरिन्दें"
" उजाड़ते आशियाना
लूट भी लेते खाना"
"चुप रहना भी सिख
किसी को ना दिख"
"ये कलयुग की नीति
साथ रखना यह रीति।"
रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. +918085104647
मंगलवार, 22 सितंबर 2015
श्रवण साहू
आज मन में बहुत ही खुशी हैं गुरूवर ईश्वर लाल साहू जी की कृपा से आज18-09-2015 को राष्ट्रीय कवि संगम मुक्ताकाशी के सान्निध्य में संस्कृति विभाग रायपूर के मंच पर वरिष्ठ कवियों के सान्निध्य में कविता पाठ करने का मौका मिला। मैं गुरजी को कोटि-कोटि प्रणाम ज्ञापित करता हूं।
- श्रवण साहू