मंगलवार, 25 अगस्त 2015

रक्षा बंधन पर्व पर श्रवण साहू का कविता

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अधिकार नही तुझें भैया मेरे आज राखी बंधवाने को,
मुझे तो बहना कहते तुम बाकि को जाते सताने को।

दोस्तों संग मिलके कितनों को परेशान तुम करतें हो,
घिनौंना हरकत करतें आखिर क्यों नही तुम डरतें हो।

तुम्हारे ही खातिर न जाने कितनें ही रोज ऐसे मरते हैं,
रोती बिलखती कितनें दुष्कर्मों की अग्नि में जलते हैं।

क्यों न याद करतें तुम उस वक्त अपनी इस बहना को,
भुल जाते क्यों ऐ भैया हमारे माँ-बाप की कहना को?

रक्षा सूत्र बांध पापी को क्यों रिश्ता यूं बदनाम करूं,
अपराधी हो तुम भैया मेरे,तुमसे मैं भी हरपल डरूं।

रक्षा करूंगा सबकी बहनों का गर ऐसा संकल्प करो,
हँसते बांध दुँगी राखी तुमको तुम न मुझसे ऐसे डरो।
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रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा, बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. - 8085104647

गज़ल - श्रवण साहू

                 गज़ल

सुख की चाह रख,चलते-चलते हम,
जीवन के कठिन मोड़ से निकला था।

मची थी हलचल शायद कुंडली में मेंरे,
शनि के हाथों की मरोड़ से निकला था।

आवाक सा हो गया था पूरी डगर में,
छुके गुजरी मौत ऐसे रोड से निकला था।

रोता और बिलखता रहा मैं उम्र भर,
अपनी मंजिल जो छोड़ के निकला था।

गुस्ताखी यह था मेरा सुख के खातिर,
प्रकृति के नियम को तोड़ के निकला था।
                     
                        ✏ श्रवण साहू

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

मया के गोठ

  
                                  
       !! फुलकईना !!

मया के डोरी मा बाँध के,
           धरधर मोला रोवाये!
बिलख बिलख मन रोये,
         आँखी ले आंसु बोहाये!

सहावत नईहे अब पीरा हा,
             अऊ कतका धीर धराबे।
सुसक सुसक के दिल रोये,
               मोर तो चेत हरागे।

तोला देखेबर नयन तरसत हे,
              मोर मन होगे उदास।
तोर अगोरा मा रस्ता देखत,
             जीव मोर होगे हदास।

आजा रे मोर फुलकईना तै,
            मोला जादा झन रोवा।
मोर जिनगी मा गढ़दे फुल
              काँटा झन वो बोंवा।

तोर बिन मोर जिनगी के,
              नईहे कोनो थिरभाव।
मोर जिनगी मा फुल खिलाके,
                करदे मया के छाँव।
करदे मया के छाँव।
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रचना@ श्रवण साहू
गांव - बरगा जि. बेमेतरा (छ. ग.)
मोबा.-+918085104647

छत्तीसगढ़ के महिमा

       ।।छत्तीसगढ़ महिमा।।

जय जय हे छत्तीसगढ़ महतारी।
         तोर महिमा जग मा बड़ भारी।।
ऋषि मुनि अऊ तपसी के डेरा।
         सबो जीव जंतु के तैंहा बसेरा।।
हरियर हावय मा तोर कोरा।
           रूप तोर मोहय चंद्र चकोरा।।
तीरथ तंही, तंही चारो धाम।
         पांव रखे जिंहा मोर प्रभु राम।।
बड़ निक लागे धनहा डोली।
         हवे सुग्घर तोर गुरतुर बोली।।
धान पान के तैंहा उपजईया।
         सबो प्राणी के प्रान बचईया।।
बड़े बिहना कोयली गुन गाये।
        चिरई चिरगुन महिमा बताये।।
नाचय रूखवा झुमरय खेती।
       भारत मां के तैं दूलौरिन बेटी।।
नरवा, डोंगरी मन ला भाये।
       परबत मुकुट शोभा बढ़हाये।।
तोर चरण मा माथ नवांवय।
     तोर'दुलरवा',गुन तोर गांवय।।
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रचना@श्रवण साहू
गांव-बरगा जि. बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. - +918085104647

बुधवार, 19 अगस्त 2015

मोर गांव मा रोज मेला

।।मोर गांव मा रोज मेला।।

छत्तीसगढ़ के कोरा मा बसे,
          मोर गांव मा रोज हे मेला।
आठो काल बारो महिना,
         बिहनिया ले संझा के बेला।

कुकरा बांसत होत बिहनिया,
              डबर रोटी वाले आथे।
लईका,जवान अउ सियनहा,
           चाय मा बोर बोर खाथे।

ओकर पाछु चिल्लावत आथे,
           कोचनीन हा धरे मोटरा।
आनी बानी साग भाजी लाथे,
         पताल,रमकेलिया,बटरा।

ऊवत सुरूज पांव मढ़ाथे,
          केंवटिन हा बोहे टुकेना।
भोक्का लाड़ु,लाई,मुर्रा
          बेंचत चना अऊ फुटेना।

साईकिल के घंटी बजावत,
         अब फुग्गा वाले हा आगे।
केंश के बदली पिन अउ फोटू,
           लईका मन सुनते भागे।

होगे बेरा  कपड़ा वाले के,
            चढ़ के स्कूटर मा आय।
कुरथा पेंट धोती पजामा
             साड़ी हा मन ला भाय।

बेरा डरकत संझौती समय,
             ठेला लागावय मनिहारी।
बेटी बहू टिकली फूंदरी बर,
             सकलागे सब पनिहारी।

अईसन मेला भराथे संगी,
              मोर बरगा गांव मा रोज।
दया मया के निरमल छांव,
             आजाते गा मोर गांव सोज।
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रचना@ श्रवण साहू
गांव-बरगा जि. बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा-08085104647

।।जमाना।। - मुक्तक

         ।। जमाना।।
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सुन मुसाफिर अब जाग
          संतन के संग मा लाग।
भागम भाग मात गे जी
         जमाना मा लागे आग।

जब कोलिहा छेड़य राग
         ता कोयली गय भाग।
हंस खाय गोंटी माटी
         मोती खावत हे काग।

लुटेरा गेहे अब जाग,
            मितान होगे हे नाग।
ये कईसे दिन रे बाबा,
            चंदा मा लगे हे दाग।

स्वार्थ कैची,प्रेम ताग,
           परे धार, टुटगे धाग।
अतका भुखागे मनखे,
        जीव-जन्तु बनगे साग।

सुन मुसाफिर अब जाग,
          संतन के संग मा लाग।
भागम भाग मात गे जी,
          जमाना मा लागे आग।
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रचना @ श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.- 08085104647
 

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

भादो के महिना

       ।। भादो के महिना ।।
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सावन के महिना सहीं,
        भादो घलो पबरित लागे।
फुलगे अंगना,चंदैनी गोंदा,
             जगमग ले जगमगागे।
रंजनी गंधा,गुलाब,मोगरा,
              महर-महर महमागे।
मिट्ठू कोयली मैना के भाखा,
           संग गाये के सुध जागे।
करमा ददरिया पनिहारिन के
          हिरदय ला सबके भागे।
नाचत बंदरिया मदारी के,
          देखत मन खुशी समागे।
रूखराई घलो झुमरत हे,
            देख नाचे के मन लागे।
गाय गरुवा के घुंघरु घंटी,
           घड़र-घड़र संग बाजे।
सुनत बंशी बरदिहा के,
        रस्ता मा घड़ी बिलमागे।
नरवा के झरझर पानी,
            देख गंगा जईसे लागे।
भजन कीर्तन भक्तन के,
         सुन दुख पीरा बिसरागे।
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रचना@श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. -08085104647