शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

युग संदेश

।।। युग-संदेश ।।।
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चलो चलें अब मिलकर फिर से,
            स्वतंत्र तिरंगा फहराने को।
मुक्त किये जो पराधीन से हमें
          उन शहीदों के गुण गाने को।

चलो चलें अब मिलकर फिर से,
           एकता के कदम बढ़ाने को।
हो गये कुर्बान हमारे खातिर,
           उन्हें श्रद्धा फूल चढ़ाने को।

चलो चलें अब मिलकर फिर से,
           अपनी हिम्मत दिखाने को।
कापुरूष कहते जो बैरी हमको,
            वीरता उसे भी बताने को।

चलो चलें अब मिलकर फिर से,
             एक नया मुकाम पाने को।
सोने की चिड़िया भारत मां में,
          एक नयी दीपक जलाने को।

चलो चलें अब मिलकर फिर से,
             एकता की मार्ग बनाने को।
हंसेंगे संग में रोयेंगे संग में,
          एक नई सुविचार बताने को।
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।। जय हिन्द ।।*।। जय हिन्दवासी ।।
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रचना- श्रवण साहू
गांव - बरगा, बेमेतरा (छ. ग.)
मोबा. - 08085104647

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

।।। हरेली गीत ।।।

   ।।। हरेली गीत ।।।
                   - श्रवण साहू
   आय हे हरेली आय हे हरेली,
   सुनव संगी अऊ नँघरिया
   जाबो अमरईया गाबो ददरिया,
   चलव चलव जँहूरिया।²

१)गेंड़ी मा चड़बो रस्ता गड़बो,
    आनी बानी पेड़ लगाबो,
    खो-खो खेलबो झुलना झुलबो,
    पूरखा के रीत बचाबो,

    *आगे हे बेरा नईहे अगोरा.... ²
    मेहनत करबो हलधरिया
                 जाबो अमरईया....

२)बड़े भिनसरहा धनहा डोली मा,
    गुड़हा चिला गड़ाबो,
    नागर बिंधना टंगिया धोके
    ठाकुर देव ला मनाबो,

   *सुमर सुमरनी देवी देवता के... ²
    झूमर बरसाही बदरिया
                    जाबो अमरईया.....

       रचना- श्रवण साहू
      गांव - बरगा थानखम्हरिया
       मोबा. -8085104647

बुधवार, 12 अगस्त 2015

संगीत - भजन करने का साधन

"काव्य शास्त्र विनोदेन-
                           कालो गच्छति धीमताम्।।"

रचना चोरों की महानता

चन्द लाईनें उनके नाम जो दूसरों के
मेहनत में अपनी वाह वाही बटोरते हैं-

मै भी एक कलाकार हूँ।

मानो या ना मानो सखा
माध्यम हूँ विचार फैलाने का।
सबकी रचना अपनी नाम कर,
दिल जीत लूँ मै जमाने का।

मेहनत मै न करता फिर भी,
कितने लाईक, मुझे ही आते।
मै अनोखा सा लगता हू सबको,
न जाने कितने, मुझे ही भाते।

मै सीमित हूं वेब तक ही,
वास्तविक में,मै नकलमार हूँ।
कर्ताओं के कृपा पात्र हूँ मै,
क्योंकि मैं भी एक कलाकार हूँ।
                   ✏श्रवण साहू
              गांव-बरगा थानखम्हरिया

कहानी (देखा देखि मा गलती)

धियान लगाये सुनहू संगवारी काहत हव आज कहानी,
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एक घंव के बात ये गा, एकठन हवई जहाज मा एक झन सेठ अऊ ओकर पोंसे मिट्ठू, दूनो झिन बढ़िया सफर करत रहीथे, हवई जिहाद बने उड़त  हे।  बीच मा होथे का? एक झन एयर  होस्टेस नोनी नाहकत रहिथे आगु ले,, ओला देख डरिस मिट्ठू हा,  अऊ ओहा मार दिस  सीटी, वोला  सुनिस हवई सहायिक नोनी हा अउ ओहू हा हलू कन धीरे से मुस्का दिस, बात कट गे जी,!
                     थोरकुन बाद मा फेर वो हवई सहायिका हा वापस लहूटत रहय,अब तो ए पईत सेठ जी सीटी मार दिस, नोनी राहय तेन भड़क गे,  वो हा आगे जाके सिकायत लिखवईस,  अब पोंगा मा ऐलांउस होईस के वो दूनो झन सीटी बजईया मन ला हवई जहाज ले फेंके जाय, दुनो झन ऊपर भारी बड़ अलहन आगे गा।  एक दूसर के मुहू ला बोट बोट देखे,  मिट्ठू सेठ ला कहिथे -  कस गा तोला उड़ाय बर आथे?  भईगे सेठ बिचारा के हवा पानी बंद,  फेंका गे गा हवई जहाज ले।।
सीख:- हर बेर के देखा सिखी बने नि होय,  बिन अकल के नकल करईया खपला जथे।
                     
          - श्रवण साहू
      गांव-बरगा थानखम्हरिया

संतो के निंदक सुनो!


चन्द लाईन उनके लिये जो बिना सत्य को जाने ही  अपनी प्रशंसा के लिये,हाई लाईट होने के लिये, संतो और गुरू पर किचड़ उछालते हूऐ अनेक प्रकार के पंक्ति गढ़ते रहते हैं।
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संतो की निन्दा करने वाले,
हँसकर कभी न जी पाया है।
जाम अनेक पीये होंगे मगर,
हरिनाम रस न पी पाया है।।

आयु,वंश,सम्मान मिट गये,
जिसने गुरु पे दाग लगाया है।
खुब हंसते होंगे दिनभर,मगर
रात में कभी न चैन पाया है।

राम, कृष्ण, दिनेश महेश भी,
संतो अरु गुरू का गुण गायें है।
विवेकानंद, कबीरा, नानक जैसे,
गुरू चरणों मे शीश झुकायें है।

गुरु के ही कृपापात्र होकर ही,
ध्रुव जैसे आसमां मे जगमगाते हैं।
इतिहास भी साक्षी गुरु पक्ष में,
डाकु भी विद्वान हो जाते हैं।

दाग तो निगुरा लगा ही दिये थे,
कृष्ण राम जैसे भगवानों पर।
पालनहारी स्वामी थे जगत् का,
ग्रहण लगे उनके भी सम्मानों पर।

निश्चित ही यह कलयुग का
एक परिचय और दुष्प्रभाव है।
पिटते सज्जन सत्पुरुष यहां,
शकुनी जैसो का चलता दाव है।
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काॅपी राईट @श्रवण साहू, बरगा
दिनांक- 09-08-2015

प्रेम नगरी

विचित्र प्रेम नगरी,
कंटक अति,सँकरी।
सफल क्लिष्टतापूर्ण,
अथाह अगम गहरी।
प्रसन्न चित कभी,
तो कभी रूदन,
बिछड़ना प्रिये से,
तो कभी मिलन।
निशदिन वार्ता,
रूठना मनाना,
प्रित दिखाने को,
अश्रु भी बहाना।
एक डर भी संग,
बिछड़ने का
विश्वास भी संग,
मिलने का।

रचना - श्रवण साहू
गांव - बरगा थानखम्हरिया
रचना दिनांक- 11-06-2015