सबके मन ला मोहत हे आज गोल्ड,
आनी बानी के भाखा मा करथे टोल्ड,
पानी नई सुहावय बिना करे कोल्ड,
जुन्ना मा मन नई लागय सुहाथे सोल्ड,
जम्मो संस्कृति ला कर डारिन ओल्ड,
जादा झन इंतरा रे लकड़ी के कठवा
एक दिन होये बर परही क्लीन बोल्ड।
- श्रवण साहू
सबके मन ला मोहत हे आज गोल्ड,
आनी बानी के भाखा मा करथे टोल्ड,
पानी नई सुहावय बिना करे कोल्ड,
जुन्ना मा मन नई लागय सुहाथे सोल्ड,
जम्मो संस्कृति ला कर डारिन ओल्ड,
जादा झन इंतरा रे लकड़ी के कठवा
एक दिन होये बर परही क्लीन बोल्ड।
- श्रवण साहू
कब होही छत्तीसगढ़ मा सोनहा बिहान?
जागही जम्मो छत्तीसगढ़िया बेटा,
सोंच समझ के करही जब नेता,
नई चलही परदेशिया के सियानी,
पलट जही छत्तीसगढ़ के कहानी,
सबो नँघरिया दुलरवा मा होही गियान।
तब होही छत्तीसगढ़ मा सोनहा बिहान।
पुस्तक संग मा संस्कृति ला पढ़ही,
अपन रद्दा ला जब अपने हा गढ़ही,
अपनेच बोली भाखा ला समझही,
सबो संगी छत्तीसगढ़ी मा गरजही,
छत्तीसगढ़ी बोले मा नई परही जियान।
तब होही छत्तीसगढ़ मा सोनहा बिहान।
सुनता के रद्दा मा जुरमिल चलही,
भ्रष्टाचार के तभे बदरा हा टलही,
बेटी नारी के करही सब हियाव,
सब बर होही जब बरोबर नियाव,
परोसी के परोसी हा बनजाही मितान।
तब होही छत्तीसगढ़ मा सोनहा बिहान।
रचना- श्रवण साहू
गांव - बरगा,जि.-बेमेतरा
मोबा.+918085104647
. अरि सखी!
करती ठिठोली मिल सब सहेलियाँ,
अरि सखी! अब तो बुझो पहेंलियाँ।
शर्माना छोड़ पगली सीधी तु बता,
तरूणमयी! तुझे रहा कौन सता,
किसकी तूम बन बैठी सजनियाँ।
अरि सखी!......
नजरों में झुलते शायद तेरे वें कुंवर,
शांत हो तु लगाती ध्यान हर प्रहर,
नाम अब सुझा,न कर अठखेलियाँ।
अरि सखी!......
किसकी कान्ता प्रियसी वल्लभा,
लावण्यमयी!किसकी तू सुलभा,
सांवरी कौन हैं तेरी सांवरियाँ।
अरि सखी!.....
कौन तुम्हारे प्रियवर हे रमनी,
किसकी तुम रागिनी प्रणयिनी,
बता भी दे किसकी तू जोगनियाँ
अरि सखी!....
रचना - श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा
मोबा.-+918085104647
।।छत्तीसगढ़ी कहानी - कुसंगत के फल।।
लेखक- श्रवण साहू
छत्तीसगढ़ के पावन धरती मा भरतपूर नांव के एकठन गांव राहय। भरतपूर गांव मा रामस्वरूप नांव के ब्राम्हण रहय।रामस्वरूप के पत्नी यमुना बाई अऊ दू झन बेटा रहीस बड़े बेटा के नांव देवेन्द्र जेन 11 बछर के होगे हे अऊ दिखे मा बड़ सुघ्घर गोरा नारा हे अऊ ओकर ले सुघ्घर रामस्वरूप के छोटे बेटा सुरेन्द्र जेन अभी 9 बछर के होगे हे। रामस्वरूप के जईसन नांव हे वईसने ओकर गुन घलो रहय, रामस्वरूप बड़ संतोषी ब्राह्मण रहे, गांव मा यजमानी, कथा हवन पूजन प्रवचन आदि करय अउ अपन परिवार के पालन पोषण करय अऊ लईका मन ला पढ़हावय। रामस्वरूप अऊ यमुना के सपना रहय कि बड़े बेटा देवेन्द्र गांव मा यजमानी करय, प्रवचन करय, वेदपाठी होवय अऊ दूनो के दुलरवा बेटा सुरेन्द्र हा डाॅकटर बनय। समय के जावत देरी नई हे संगवारी रामस्वरूप के वृध्दावस्था आगे,देवेन्द्र अऊ सुरेन्द्र अब जवान होगे, देवेन्द्र कुमार 12वीं तक पढ़िस अऊ अब पूजा पाठ करे मा निपूण होगे पिताजी के आशिष ले मंत्रोच्चारण के गुन घलो पागे अऊ सुघ्घर गांव के यजमानी करे लागीस अऊ अपन संगवारी बनालिस वोहा परमात्मा ला, धर्म शास्त्र ला, वेद पाठ ला,सत्संग ला।छोटे बेटा सुरेन्द्र घलो अपन दाई ददा के सपना पूरा करे खातिर, लक्ष मा धियान लगाय,उंचा पढ़ई बर डाॅक्टरी कालेज रायपूर चल दिस। देवेन्द्र तो अब हरि संग प्रेम लगा के अपन गियान ला गांव-गांव मा बांटे बर धरलिस, हव संगवारी देवेन्द्र अपन लगन ले आज भगवती पण्डित बनगे, जतका मुद्रा दक्षिणा मा पावय ओकर पौना भाग ला अपन पास गृहस्थ चलाय बर रखय अऊ बाकि सबो पईसा ला अपन छोटे भाई के पढ़ाई बर रायपूर भेज देवय। ऐती सुरेन्द्र बिन मेहनत के पईसा पा-पा के बिगड़त जात हे। कहे घलो के हे संगवारी बिन मेहनत के पाये हिरा बर घलो पिरिया कम रहिथे। मानव कंहू सत्संग नई करही ता कुसंगति मा जरूर परही।वईसने हाल आज सुरेन्द्र के होगे हे संगवारी,शहर के बिगड़े नवाब संग मितानी होगे हे रोज के गुंडा बदमासी करई, संगवारी मन संग होटल मा खवई होगे रहय, अब तो सुरेन्द्र "बढ़ स्वतंत्र सिर पर नहिं कोई" होगे। सुरेन्द्र कुसंगत मा पढ़ के अपन कुल, मर्यादा, नियम ला भुलागे अपन लक्ष ला भुलागे।
बड़े भैया के मेहनत के पईसा ला कुसंगत मा परके मदिरा पान अवारापन मा उड़ाय लगिस अउ अपन भविष्य के रस्ता ला भुलागे।अईसन ऐसो आराम हा अल्पकालिक रथे,आखिर वो समे आगे जेन सुरेन्द्र के कुकर्म के फल देने वाला हे।सुरेन्द्र के परीक्षा परिणाम आगे, रात दिन कुसंगत मा परे रहने वाला सुरेन्द्र आज सबो बिषय मा फैल होगे हे, सुरेन्द्र अपन जिनगी ला बेकार तो करिडर राहय अब सुरेन्द्र सोच मा परगे कि मै दुराचारी हव अपन भैया के मेहनत के लाखो पईसा ला भोग विलासिता मा लगावत गेंव,झुठ बोल बोल के पईसा मांगत गेंव अऊ अपन परिजन ला धोखा देवत गेंव, सुरेन्द्र के मन मा अपन आप बर ग्लानि के भाव उठे लागिस अऊ वोहा सोचिंस अईसन पापीं जीव ला जिये के कोनो हक नईहे कहिके आत्मा हत्या करेबर सोचत रहिथे।उही बेरा देवेन्द्र हा सुरेंद्र ला देखे गजब दिन होय हे कहिके अपन छोटे भाई ला देखे बर पहूंचजथे।सुरेन्द्र किराया के कुरिया मा रहय। उंहा पहूंचते ही देवेन्द्र का देखथे? सुरेन्द्र अपन घेंच मा फांसी अरोवत रहय, अईसन स्थिति ला देख देवेंद्र तुरते सुरेन्द्र के हाथ ले रस्सी ला झटक के कारण पुछथे।सुरेन्द्र हा पश्चाताप के आगी मा जरत, रोवत रोवत पूरा किस्सा ला देवेन्द्र ला बताथे।देवेन्द्र तो आत्मज्ञानी अऊ भगवती पंडित रहय संगवारी। सुरेन्द्र के मन मा अईसे ज्ञान डारथे अऊ समझाथे जेकर ले सुरेन्द्र घलो चेत जथे। अब तो देवेंद्र हा हर पूजा-पाठ मा सुरेन्द्र ला संग मा लेगय अऊ वहू हा सिखे खातिर अपन भैया संग हांसी खुशी जाय। अऊ आनन्दमय अपन जीवन ला बिताय लागिस।
।। जय जोहार जय छत्तीसगढ़ ।।
✏श्रवण साहू
गांव-बरगा जि.-बेमेतरा
मोबा.-8085104647
हे मनुज!
- श्रवण साहू
हे ब्रह्म वंशज! देवतूल्य तूम्ही,
अशोभनीय समा बैठा गुण,
छोड़ दियो पुरुषार्थ का मार्ग,
बन गया किंकर्तव्यविमुढ़।
उदासीनता कर शीघ्र त्याग,
प्रसन्नचित्त हो,कर कर्म,
राग,द्वेष,काम,क्रोध छोड़,
जीवश्रेष्ठ निभा मानवता धर्म।
मलहीन निश्चिंत निर्मल हंस,
कब हुआ तू घोंघाबसन्त,
न फंस मोह माया प्रपंच में,
अब बनता जा अरिहन्त।
...६९...
।।महतारी के बोली भाखा।।
....मोर छत्तीसगढ़ीन दाई के
मीठ मंदरस कस बोली हे....²
हरियर ईंहा धनहा डोली हे,
भरे नरवा तरिया बौली हे,
रोज तिहार जस होली हे,
अऊ गीत गावत कोयली हे,
मोर छत्तीसगढ़ीन दाई...
जिंहा पनिहारिन के टोली हे,
नारी परानि बड़ भोली हे,
करे हांसी अउ ठिठोली हे,
फेर झार बंदुक कस गोली हे
मोर छत्तीसगढ़ीन दाई...
भले नान नान ईंहा खोली हे,
फेर बसे बम्लाई माँ मौली हे,
जेन भरे सबके झोली हे,
माटी हा जिंहा के रोली हे,
मोर छत्तीसगढ़ीन दाई...
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***जय छत्तीसगढ़ महतारी***
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रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा जि-बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा.- +918085104647
बेजुबान
लेखक- श्रवण साहू
तीजा पोरा के सुघ्घर मनभावन परब रहीस, फुफु दीदी, पूर्णिमा बहिनी, रुखमनी दीदी, उत्तरा दीदी सबो झन के आये ले घर हा भरे भरे लगत रहीस। रोज के दीदी मन के संग मा तिरी पासा,सांप सीढ़ी,बिल्लस अऊ गोंटा खेलई हा तो हमर सबो झन के दिनचर्या बनगे रहीस अऊ अईसनहा समे हा साल के सबले सुखद दिन रहिस।शेरु हा तो मोर नान्हे-नान्हे भांचा भांची नमन अऊ शिखा के सबले बड़े संगवारी बनगे रहिस,वो मन हमन ला तो भाबे नई करय, लागे रहय शेरू ला खेलई मा। शेरु अऊ कोनो नई बल्कि हमर पोंसे कुतिया बबली के लईका हरय। हमर डोकरी दाई के छोड़ सब झन वोला मया करय। शेरू ला सब झन नान्हे लईका सरिक मया करय अऊ सेरू तको हा अपन नियम कायदा मा राहय अऊ अपन सीमा अंगना ले परछी मा घलो नई चढ़त रहिस।
एकदिन मंझनिया कन फुफु दीदी भर घर मा राहय अऊ लईका सियान जम्मो झन नरवा मा नहाय बर चलदे रहय, मैं हा बियारा मा लकड़ी चिरत रहेंव अचानक मोला सेरू के भूंके के आवाज आईस थोरकुन देर बाद मा ओकर रोय के आवाज आईस मैं लकर धकर दौंड़त घर गेंव, सेरु हा अंगना मा डलगे रहीस अऊ फुफु दीदी डंडा मा सेरू ला पिटत रहय,चाह के भी मोर मुंह ले भाखा नई निकलत रहय काबर कि मोर फुफु दीदी थोरकिन बात मा रिसाजथे अऊ दू चार ठन सुना के घर ले भाग जथे। ठऊका बेरा मा सबो झन नहाके घलो आगे अऊ उत्तरा दीदी हा फुफु दीदी के हाथ ले डंडा ला झटक के गुस्साये स्वर मा पूछिस- " का होगे दीदी सेरू हा का गलती करे हे? तेमा ओला निरदयी बरोबर मारत हस।"
फुफु दीदी-" उत्तरा तैं कुछु बात ला नई जानस कले चुप राहा"
उत्तरा दीदी-"ता का होगे बताबे तभे तो जानबो वो।"
फुफु दीदी-"ये सरवन टूरा ला पूछ ना का होगे तेला"
(उत्तरा दीदी हा लाल आंखी ले मोर डाहर देखिस)
मैं -"मै कुछू बात ला नई जानव दीदी मैहा बियारा मा लकड़ी चिरत रहेंव ता सेरु के आवाज सुनेव ता दौरत आयेंव ता दीदी हा सेरू ला पिटत रहीस,(अतके कहिके मैं चुप होगेंव।)
फुफु- " मैं हा माई कुरिया मा बईठके चाउंर निमेरत रहेंव ता अचानक देखेंव ये सेरु हा भुंकत भुंकत परछी मा चढ़गे रहिस ता मैं येला येकर गलती के सजा देहंव।
(अतका ला सुन के सब झन चुप होगे, उत्तरा दीदी कपड़ा ला सुखोय बर धर लिस, फुफु हा चांउर निमेरे बर धरलिस महू बियारा जात रहेंव फेर मोर मन माढ़त नई रहिस मैं पूर्णिमा ले एक गिलास पानी मांगेव।
पूर्णिमा जईसे ही रंधनी खोली मा गिस जोर से चिल्लाईस।सबो झन के नजर रंधनी खोली डाहर होगे ऊंहा ले एकठन बिलई निकलिस जेन हा सब भात, दुध, रोटी मन ला चट कर डारे राहय अऊ बचत ला गिरा दे राहय। ईही बिलई ला भगाय अऊ जनाय बर सेरू हा परछी मा चढ़े रहीस।
( सबो झन हा गुस्सा के भाव ले फुफु दीदी ला देखत रहीस, अऊ फुफु दीदी के नजर हा घलो झुकगे रहिस अऊ ऊहू ला अपन गलती के अहसास होगे रहिस अब फुफु तको हा सेरू ले मया करे लागिस।)
ओखर बिहान दिन संझौती बेरा रूखमनी दीदी, पूर्णिमा बहिनी अऊ डोकरी दाई तीनो झन कोठार बरबट्टी अऊ भाजी टोरे बर जात रहीस उंकर संग मा जाय बर नान्हे-नान्हे नमन अऊ शिखा घलो रोय बर धरलिस, हार खाके डोकरी दाई दूनो झन ला दोनो झन ला दूनो हाथ मा पा लिस, उंकर पाछु-पाछु सेरू तको हा कोठार चल दिस। कोठार मा कांदी कचरा के मारे रद्-बद् लागत रहिस दूनो झन लईका मन ला डोकरी दाई हा रूंख के नीचे मा बईठार के चेतईस - " कोठार मा रद्-बद् के मारे किरा मकोरा होही तुमन ये मेर ले टरहू झन। लईका मन ला चेताय के बाद मा तीनो झन बरबट्टी टोरे बर धर लिस।
थोरिक बाद नमन के आंखी मा एक ठन फांफा दिख गे वोहा ओला पकड़े खातिर कांदी के बीच रद्-बद मा खुसर जथे वोकर पाछु सेरू तको चल देथे फांफा तो उड़ा जथे फेर ये का? नमन के पांव मा डोमी सांप के पूछी हा खुंदा जथे, सांप हा गुस्साके फन कांड़ लेथे अउ अबक-तबक नमन ला काटने वाला रहिथे तईसे मा सेरू हा सांप अऊ नमन के बीच मा आके सांप के मुड़ीच ला अपन मुंह मा दबा के सांप ला मार डरथे अऊ भुंके बर धर लेथे सबो झन हा सेरू मेर आके सकला जथे रूखमनी हा धरा-रपटा नमन ला उठाथे। सेरू के मुंह मा सांप ला देखके सब झन अकबका जथे। अचानक सेरू हा भुंईया मा घोलंड जथे अऊ रोय बर धर लेथे। पूर्णिमा हा दौड़त मोला बताय खातिर घर आईस, महूं हा बात ला सुनत साट दौंड़त कोठार गेंव, जाके देखेंव ता डोकरी दाई अऊ रुखमनी दीदी दूनो झन के आंखी ले आंसू के धार बोहावत हे, सेरू हा मुरछा खाय धरती मा परे हे ओकर मुंह मा खुन हे वोकर जीभ मा सांप दंश के चिनहा हे अऊ ओकर आगु मा सांप हा मरे परे, देखते ही मै अपन आप ला नई रोक पायेंव सेरू ले लपट के रोय बर धरलेंव मोर आंखी ले आंसु गिरे लागिस, देखते-देखत घर के सबो झन सकलागे। सब के आंखी ले आंखी ले आंसु बहिगे। सबले जादा रुखमनी दीदी रोवत रहिस अऊ सब ला बताईस कि आज ये सेरू हा मोर बेटा नमन के खातिर अपन जान गंवादिस आज हम सबो झन सेरू के कर्जदार हन रिनी हन अऊ सेरू के करजा ला छूटना हमर बर असम्भव हे, अतका ला सुन के सबो झन हा सेरू ले लिपट के अऊ जादा रोय बर धरलिस अऊ सहीं मा हमन ला अपन आप मा बहुत दुख लागीस, काबर की आज हमन ओ बेजुबान के कर्जदार हन जेला छूटना ये जनम छूटना हंथेरी मा सरसो उगाय के समान हे।
। जय जोहार जय छत्तीसगढ़।