।।। कुण्डलियाॅ ।।।
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तिरंगा हमर शान गा, आय भारत के मान।
तीन रंग के झंडा हा,हिंदु के हरय अभिमान।
हिंदु के हरय अभिमान,सब कोई गुन गावै।
सुनाय भक्ति के गीत,मुसलमां घलो भावै।
कह'श्रवण कुमार साहु',फूल गिरे रंग बिरंगा।
सब झन टेकय माथा,जय होवै तोर तिरंगा।
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रचना-श्रवण साहू
गांव- बरगा, थानखम्हरिया
बुधवार, 12 अगस्त 2015
कुंडलियॉ
रविवार, 9 अगस्त 2015
कौन स्वतन्त्र हैं?
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आखिर कौन आजाद यहां?
जो स्वतंत्र दिवस मनाते हैं।
दिखता सत्य सबको मगर,
यूं ही क्यों दिल बहलाते है।
न स्वतंत्र वह अजन्मी बच्ची,
इस भव सागर में आने को।
आ भी गयी तो क्या सहीं?
तकते दरिंदे,उन्हें मिटाने को।
क्या स्वतंत्र हर घर की बेटी?
उंची शिक्षा को पाने को।
कितने बैठे दुश्मन देख लो,
सक्रिय है इन्हें सताने को।
आजाद नही है नेंक जवान,
अपनी विचार फैलाने को।
सच बोले झुठ लगता है,
खुद झुठी,इस जमाने को।
आम जनता,गुलाम नेता का,
क्या मनमर्जी कर पाता है?
उगाता खुद ही अन्न मगर,
नेता दे,तब ही खाता है।
कितनी और झुठी तसल्ली?
देते रहेंगे दिल को हम।
अच्छा होता गर होता ऐसा,
खुद स्वतन्त्र हो,रखता दम।
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काॅपीराईट@श्रवण साहू
पता-बरगा,थानखम्हरिया
मोबाइल-08085104647
दिनांक- 10-09-2015
ये वो महंगई बहिनी
ये वो मंहगई दीदी
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ये दीदी!सुन ले वो मोर बात!
गोहारत हन हम,दे हमर साथ!
झन कर हमला तना नना,
हम मजदूर गरीब के जात।
तोर भतिजा मुड़पेलवा भ्रष्टाचार!
बैरी बनगे,करथे अत्याचार!
संझा बिहनिया मारथे डंडा,
नाच नचाथे नागिन पार।
दूखिया ला अउ झन दुखा!
परत हे उपर ले अऊ सूखा!
दूबर बर दू अषाढ़ होगे,
हम मर जबो अईसने भूखा।
बेरोजगारी मा होगेन रीता,
पेट घुसरगे अब एक बीता,
मात गेहे दीदी करलई वो,
पसिया पिथन नईहे सीथा।
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✏श्रवण साहू
गांव-बरगा,थानखम्हरिया
रविवार, 2 अगस्त 2015
एक विरह गाथा छत्तीसगढ़िया का - श्रवण साहू
।।। एक विरह गाथा ।।।
- एक छत्तीसगढ़िया
सूदूर प्रदेश से आया था,
बेसहारा एक मेहमान।
बेघर, अपरिचित थे मगर,
मैने दिया उसे सम्मान।
पहनने को कपड़ा दिया,
खाने को दिया रोटी।
कोना घर का रहने को,
दिया काम था छोटी।
खेत जाता साथ मेरे,
हाथ संग मे बटाता।
बन गया दिनचर्या यही,
अजीब सा हो गया नाता।
दर्जा दे बैठा भी मैने,
उसे बना दिया हकदार।
मै तो अनपढ़ था मगर,
वो सातिर, समझदार।
ऐसा हूआ अब मेरे घर में,
उसका चलता राज।
मै मजदूर सा लगता अब,
वो बन गये महाराज।
मै बुढ़ा हो गया था,
उसका था जवानी
ये कैसा दिन आ गया,
करता वह मनमानी,
मेरे ही घर,मै गुलाम
आदेश वही चलाता।
असमर्थ देंह मेरा था
कितना और कमाता।
अब अत्याचारी बन,
मुझे बहूत सताता,
अहसान भुल गया अब,
उसे रहम न आता।
क्या कर सकता था,
हो गया था मै लाचार,
बेसहारा बेघर कर दिये,
करके वह अत्याचार।
कौन था मैं? कौन मेहमान?
मैं छत्तीसगढ़िया,।
परदेशिया मेहमान।
कटू लगे मगर सत्य यही
देख लो अभी वर्तमान।
रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा थानखम्हरिया
मोबा. 08085104647
चौपाई- वर्षा वियोग पर
।। अथ बरषा प्रतिवेदनम् ।।
भये श्रावण कर्तव्यविमूखा।
कारण कवन पड़यहि सूखा।।१।।
बिकल इत उत जीव बिचारा।
लागहि कैसो नांव किनारा।।२।।
चैन न आवहि मोहे दिनराता।
बैरहि मेघ,नीर नहि बरसाता।।३।।
सूखहि तरु,नदि नहि नीरा।
देखहू नाथ बाढ़हि मम पीरा।।४।।
उपजहू मनहि विविध कलेशा।
सुनहू बिपतहारी गणेशा।।५।।
रोवहि नाथ इंहा नर नारी।
संकट बिकट परो गिरधारी।।६।।
होई केवल संकट दिन चारी।
देखहू जगपति दशा हमारी।।७।।
कछुक दिन रहहि यह बाता।
मिटहि सृष्टि सुनहू जगधाता।।८।।
बिनति अब सुनहू प्रभु मोरा।
चरण सरोज पखारहू तोरा।।९।।
।। दोहा ।।
तात अरज बिकल हो करिहउ
सुमर सुमर गुन गांवहु।
करहू 'श्रवण' बिनती पूरंदर,
घुमर घुमर बरषावहू।।१।।
रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा थानखम्हरिया
मोबा. +918085104647
शनिवार, 1 अगस्त 2015
हाय अब कईसन सावन
।।। विरह गीत ।।।
हाय अब कईसन सावन।
मन लगे बिरहा गीत गावन।
सबके चेत हरागे अब तो,
रोवत हे भुईयां पावन,
हाय अब.....
चमकत बिजली के डर कहां,
घुमरत बदरा के डर कहां,
गरजत घटा के डर कहां,
छलकत नरवा के डर कहां,
नईहे सौंधी खुशबु के आवन।
हाय अब.......
रोवत हे कईसे अमरईया,
सुख्खा आगी कस पूरवईया,
कईसे करही खेती कमईया,
भुलागे गीत ला अब चिरईया,
मन मा लागे हे डर्रावन।
हाय अब.....
जेठ बईसाख जस घाम छागे,
झिरिया,नरवा,तरिया अटागे,
झुमरत फसल कईसे अईलागे,
सबो परानी के मन करलागे,
लागत नईहे दुनिया मनभावन।
हाय अब....
हे उपर वाले!का करन बता ना,
कलपत मनखे ला झन सता ना
परान बचाये के रस्ता सुझा ना,
मन मा लगे आगी ला बुझा ना,
प्रभु करदे गा बरखा के आवन।
हाय अब.....
रचना-श्रवण साहू
गांव-बरगा थानखम्हरिया
मोबाइल- 08085104647
अब कैसा ऋतु पावस?
न चमकता सौदामनी,
न गरजता पयोधर,
न वृष्टि मही में,
स्वच्छ क्यों अम्बर,
उजड़ी बीहड़,
निर्जल तरंगिणी,
हुतासन सा मरूत,
न सुखद् बयार,
बरसती निदाघ
कलपता जीव,
विकल सा धरातल,
कैसा अब ऋतु पावस?
शुन्य सा निलाम्बर,
कारण क्या?
कुपित भास्कर?
मानव पाप?
या,
उच्छिन्न पूरंदर?
रचना- श्रवण साहू
गांव-बरगा थानखम्हरिया
मोबा. 08085104647