सोमवार, 27 जुलाई 2015
शनिवार, 25 जुलाई 2015
एकता के गोठ
खटकत हे मन,
छत्तीसगढ़ लुट गे,
परदेशिया के राज,
करम हरम फुट गे,
रोवत हे आज किसान,
परान ओखर छुट गे,
अंधरा होगे सरकार,
बिसवास हा टुट गे,
होवत अन्याय देखव,
पीरा हा कईसे लहूट गे
छत्तीसगढ़ तो बनगे,
स्वतंत्र होना छुट गे,
अत्याचारी हांसत हे,
सदाचारी हा कुट गे,
ता कईसे मा बनही बात?
एकता अउ गुट मे।।
सिरिफ...
एकता अउ गुट में।।
✏ श्रवण साहू छत्तीसगढ़िया
गुरुवार, 23 जुलाई 2015
आज की हालात
मै क्यों रोता हूँ दिन रैन?
मोहे अब आवय नाही चैन।
देख दुष्टों की पाप कर्म,
निशदिन बरसत मेरे नैन..
मैं क्यों रोता हूँ दिन रैन?
असमर्थ है सज्जन अब,
सुगम जीवन बिताने को,
पांव खींचे है दुर्जन उनके,
चला है उन्हें मिटाने को,
धैर्यवान की टूटी धीरता,
वह भी फँस गया जालों में,
न जाने कितने भले आदमी
अकारण गये मुहँ मे कालों के,
बुद्धि जीवी भ्रम में पड़ गए,
आयी आंधी भ्रष्टाचार की
संत पुरुष यातना में पड़े,
जोर पड़ा है अत्याचार की,
कितना और होगा अपराध,
रोक दे भगवन खेलना खेल,
वसुधैव कुटुम्बकम हो जाये
सर्व प्राणी में हो जाये मेल,
इतनी-सी आस 'श्रवण' कर,
अब मुख से न निकसत बैन,
मै क्यों रोता हूँ दिन रैन?
मोहे अब आवय नाही चैन।।
✏श्रवण साहू
गांव-बरगा, थानखम्हरिया
मेरे तन्हाई
एक गम....
सजा-ए-मौत उसी रोज मिल गया था,
जिस दिन वो मुझसे मूहं मोड़ गयी।
सफर-ए-ईश्क के उलझी हुई डगर में,
अकेला ही जब मुझे छोड़ गयी।
जानती भी तो थी, कितना चाहता हूँ मैं,
मगर ऐसे ही क्यों दिल तोड़ गयी।
मगर एक आस...
जख्म दिया तूमने,मूझे कबुल है,
मगर मरहम तो लगाती जा।
आशियाना भी उजड़ गया मेरा,
थोड़ा ही सहीं, बसाती जा।
सुख गयी मेरे जीवन की बगिया,
रोती कलियों को सजाती जा।
हम बिछड़ गये, गम तो है मगर,
खुशी के लिए मुस्कुराती जा।
- श्रवण साहू
गांव-बरगा, थानखम्हरिया
मै हिन्दू हूँ मै भगवा धारी हूँ
सुरज की पहली किरण में भी बसा,
हम हिन्दू की मान है, स्वाभिमान है।
जलते दीपक के ज्वाला मे भी देखा,
परिचय देता, अब भी इसमें जान है।
ऋषि मुनि सन्यासी तपसी भी,
गाते है! जपते रहते इनके गुणगान है।
धर्म सीमा के कर्तव्य निष्ठ जवां भी,
कहते है हरदम, यह हमारा शान है।
हिन्दुस्तान की मिट्टी, हिन्दवासी हूँ,
सिर पर भगवा धारण,मेरा पहचान है।
✏श्रवण साहू
रविवार, 12 जुलाई 2015
सावन के महिना
रिमझिम बरसत पानी सावन मा,
चलव मया के गीत गाबो!
सबो तिहार ला धरके आगे,
जूरमिल के तिहार मनाबो!!
खाँद मा बोहे काँवर ला,
बम-बम भोला के भजन गाबो!
मन मा बिसवास,रेंगत दऊड़त,
चलव बाबा नगरिया जाबो
लगते सावन मा हरेली तिहार,
अपन देवी देवता ला मनाबो!
नांगर हसिया टंगिया सजाके,
सुघ्घर गुड़हा चिला खाबो!!
नदिया के तीर पीपर खाल्हे,
झुलना ला फंदाबो!
आेसरी पारी झुलबो झुलाबो,
संग मा ददरिया गाबो!!
रूचुक रूचुक गेड़ी मा चढ़के,
गली खोर ला जनाबो!
अंगना दूवारी परछी डेरौठी
सरी घर ला हमन मताबो!!
नाग पंचमी के दिन सब मिल,
बगीच्चा पार जाबो!
नाग देव के पूजा करके,
भिंभोरा मा दुध चढ़ाबो!!
स्वतंत्रता दिवस के पावन परब,
जम्मो शहीद के सुध लमाबो!
तिरंगा फहराके माथ नवाबो,
भाषन, गीत कविता गाबो!!
भाई-बहिनी के पबरित तिहार,
राखी बहिनी ले बँधवाबो!
हँसी ठिठोली करबो संग मा,
मिठई घलो जमके खाबो!!
अईसन हावय सावन महिना,
जूरमिल सवनाही मनाबो!
भेदभाव ला छोड़के संगी,
संग रहे के किरिया खाबो!!
✏श्रवण साहू
गांव-बरगा थानखम्हरिया
बुधवार, 8 जुलाई 2015
फूलो जैसा जीवन
💐फूल सा जीवन💐
नई सुबह नये कुंज मे,
एक माली का प्यार मिले!
एेसे हो नित नया सवेरा,
जीवन जैसा फूल खिले!!
जीवन के कर्तव्य पथ पर,
एक गुलाब तुम बन कर,
काँटो के बीच रहकर भी,
एक अलग पहचान मिले!!
बिखेर खुशबू रात रानी का,
हर दिन रात महक बिखेर,
दीन हीन को साथ मिले!!
पापों के किचड़ से बचके,
बनके कमल खिला करना,
मानवता का परिभाष मिले!!
मोगरा चम्पा चमेली बैजयन्ती,
बनके सदा महकते रहना,
तुमसे दुनिया को नव श्रृंगार मिले!!
✏श्रवण साहू
गांव-बरगा बेमेतरा (बरगा)