शनिवार, 4 जुलाई 2015

लोक कला एवं साहित्य संस्था - सिरजन

आज मोर मन मा खुशी अपार होगे,
"सिरजन" के बहाना तुहंर सकार होगे!!

०४/०७/२०१५ के लोक कला एवं साहित्य संस्था "सिरजन"  के कार्यक्रम ग्राम - अकलवारा (देवकर) मा रहिस जेन मा सबो विद्वत कवि,  साहित्यकार, संगीतकार,  कला के धनी,  अऊ सबो ग्राम वासी  उपस्थित रहिस,
वो सबो के सानिध्य मा मोर गुरूजी श्री ईश्वर साहू जी के किरपा ले महूँ ला अपन कविता " झूमरत आगे बरखा देवी" बोले के सुघ्घर अवसर मिलिस,  मै अपन गुरूजी श्री ईश्वर साहू जी ला प्रणाम करत हव!!
                               ~श्रवण साहू

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

श्रवण साहू

उसे अपना बनाना तो
कल्पना ही रह गयी,
उनका साथ निभाना तो
कल्पना ही रह गयी,
अब उसे पाना तो
कल्पना ही रह गयी,
वो प्रेम का जमाना तो
कल्पना ही रह गयी,
वो खुशी का पल तो
कल्पना ही रह गयी,
वो खट्टे मिठे हलचल तो
कल्पना ही रह गयी,
चन्द पल भी मुस्कुराना तो
कल्पना ही रह गयी,
एक क्षण भी बिताना तो
कल्पना ही रह गयी,
वो प्रेम गीत भी गुनगुना तो,
कल्पना ही रह गयी,
वो मन भर के खाना तो
कल्पना ही रह गयी

हर चीज कल्पना रह गयी मेरे दोस्त,
क्योंकि

कल्पना के बिना तो,
मेरे पूरी जिन्दगी ही
कल्पना ही रह गयी!!!
             

साथ ही एक शेर,

मन कुण्ठित हो चला है आज,
मेरे सनम् का दीदार हो जाये,
जो अदा उनमे पहले थी,
काश आज वही किरदार हो जाये!!
                     - श्रवण साहू

बुधवार, 1 जुलाई 2015

मोर दाई के कोरा

!! मोर दाई के कोरा!!

मन मोर नाचेला धरथे,
सुन के वोकर आहट!
अमरित पाये असन लागथे,
सुन के वोकर गुनगुनाहट!

भात रांधत रांधत कोन जनी,
का गीत गुनगुनाथे!
मया मा सनाय भोजन हा,
अऊ अब्बड़ सुहाथे!

कभु का हो जथे वोला,
करे लगथे ठिठोरी!
कभु मया के बरसा करथे,
सुनाके हमला लोरी!

गुस्सा जथे मोर ले ता,
बाहरी क मुठिया मा जमाथे
रो के डरवा देथव तब,
अपनेच हा चुप कराथे

जीयत हावव मेहा संगी,
अपन दाई के निहोरा!
अब्बड़ सुघ्घर लागथे मोला,
मोर दाई के कोरा!!

अब मया मा सनाय हायकु-

ऐ दाई सुन,
मया राखे रहिबे,
बात ला गुन,


    ✏श्रवण साहू
   गांव-बरगा बेमेतरा(छ.ग.)
मोबा. +918085104647

सब नन्दावत हे

नन्दावत संस्कृति के बात

दूरिहागे गा नंदागे ना,
हमर संस्कृति हा बाढ़े पूरा मा बोहागे ना!

ठेठरी,  खुरमी, अईरसा नंदागे
नंदागे अंगाकर रोटी,
पताल के चटनी नंदागे
जेमा डारय धनिया अउ चिरपोटी!

खेड़हा, पटवा, भथवा नंदागे
नंदागे तिनपनिया भाजी,
वोकर जघा मा खात हे
मैगी कस आनी बानी खाजी,

कोदो के भात नंदागे
नंदागे कनकी के चीला,
नांव ला बदल के काहत हे
इडली दोसा माई पीला,

बिहनिया के मईहा बासी अउ
नंदागे अदवरी बरी,
नई खाये के ला घलो खावत हे
तभे ये तन होगे लबरी,

कब खाबो अब लो मालपुआ ला,
मन हा करलागे गा..
दूरिहागे गा नंदागे ना,
हमर संस्कृति हा बाढ़े पूरा मा बोहागे ना!

नंदागे छत्तीसगढ़िया के
धोती अऊ कुरता,
वोकर जघा पहिनत हे
टाप अऊ बूरखा,

देखे बर नई मिलय
पिसौरी पाठ के लुगरा,
नई पहिने के ला पहिनत हे
तभे तो माते हे झगरा,

अईसन बात ला देख के सबके
मति छरियागे ना...
दूरिहागे गा नंदागे ना
हमर संस्कृति हा बाढ़े पूरा मा बोहागे ना!

हाय हलो मा जग भुलागे
भुलागे राम राम जय जोहार,
मन कलपत हे श्रवण के
पारत हे गोहार,

बचाबो अपन संस्कृति ला
देके अपन परान,
धीरे धीरे परयास करबो ता
नई होवय छत्तीसगढ़ हा दूसवार,

अईसे बात गुनत गुनत मन हरियागे ना..
दूरिहागे गा नंदागे ना
हमर संस्कृति हा बाढ़े पूरा मा बोहागे ना!!

✏श्रवण कुमार साहू
गांव-बरगा जि.- बेमेतरा(छ.ग.)
मोबा +918085104647

मोर गाँव

मोर गाँव-सब देवता के ठाँव

गांव के मुहाटी मा बईठे हे
सुघ्घर ठाकुर देव,
थोर कुन रकसहू गेस ताहन
महामाया के दर्शन पा गेव!

दू कदम अउ बढ़ जा ता
बईठे हे शंकर भोला,
चनादार बेलपतिया धरले
तभेच मनाबे वोला!

एकेच्च कन भीतरी घुसर जा
राम लखन दोनो भाई हे,
केंवट के डोंगा मा बईठे
संग मा सीता माई हे!

बीच गली मा बईठे हे
पवनसुत महावीरा,
सबके बिगड़ी बनावत हे
हरथे सबके पीरा!

भण्डार बाजू जाबे ता घलो
हावय गा हनुमान,
लक्ष्मण प्रान दाता के
करव मेहा गुणगान!

गांव के दईहान के सुघ्घर
करत हावय रखवारी ,
गोवर्धन पर्वत ला उठाय
खड़े हे मोर गिरधारी!

बुड़ती बाजु बईठे हे गा
पूरा जग के देखन हार,
लक्ष्मी माँ सेवा बजावत हे
शेष मा बईठे हे पालनहार!

हमर गांव के बीच खार मा
सौहत हे बंजारी माई,
सबके मनोकामना पूर्ण करथे
रहिथे सब बर सहाई!

सब देवता मोर गांव मा हे
सबो ला माथ नवावंव,
नानकुन बुद्धि मोर हे
कतेक गुन ला गावंवव!

काबर जाबे तीरथ बरथ
ईंहे बईठे देवता छप्पन कोटी,
चारो धाम मा पईसा झन फेंक
भुखन ला खवादे रोटी!!
भुखन ला खावादे रोटी!!

       ✏श्रवण साहू
    गांव-बरगा बेमेतरा(छ.ग.)
   मोबा. +918085104647

साहित्यकार के परिचय

     परिचय
                 -  एक साहित्यकार की

कोनो मोला ताना मारथे
हव मैहा नशा मा रहिथंव,
कोनो नोहे मोर बैरी,  फेर
सच बात ला कहिथंव,
भेदभाव नई हे मोर कना
छोटे बड़े सब ला चहिथंव,
झुठ मोला सुहावय नही
कपट ले दूरिहा रहिथंव,
जिनगी मा जऊन मिल जय
सुख दुःख सब सहिथंव,
मोर बड़े ग्यानि बिदवान के
रचना के गंगा मा नहिथंव,
सब बहत हे साहित्य गंगा मा
सब के संग महू बहिथंव,
सबे संसार मोर परिवार फेर
नानकुन कुटिया मा रहिथंव,

         ✏श्रवण साहू
      गांव-बरगा बेमेतरा(छ.ग.)
     मोबा. +918085104647

दुखिया बेटी के गोहार

     दुखिया बेटी के गोहार

मोरो मन होथे महूँ बने पढ़ लेतेंव,
इस्कुल के डेरौठी मा महुँ बने चढ़ लेतेंव!

बिहनिया बेग लटकाय,
जाथे सब संगवारी!
सब साक्षर होवत तेनमा,
एक झन मै अनारी!
सब झन इस्कुल जाके,
किताब ल पढ़त हे!
पढ़ लिख के हूसियार होके,
जिनगी ल गढ़त हे!
मोरो जिनगी ला महूँ बने गढ़ लेतेंव....
मोरो मन होथे महूँ बने पढ़ लेतेंव!!

काबर बनाये मोला विधाता,
तैं टूरी के जात!
सब रऊंदत हे हमर मान ला,
मारथे कोनो लात!
कतको बूता हम करबो तभो,
नई मिलय गुरतूर बात!
भविष्य के रस्ता सोच के,
मोरो मन करलात!
अबतो अपन हक बर महूँ बने लड़ लेतेंव...
मोरो मन होथे महूँ बने पढ़ लेतेंव!!

शुरू ले आखिर मोर जिनगी मा,
बगरे हावे काँटा!
दुनिया के जम्मो दुख हा,
होगे हमरे बाँटा!
पढ़ लिख हूसियार होके,
बने चलातेंव जिनगी!
महू ला पढ़हा दे गा ददा,
करत हावव विनती!
बिकास के रस्ता महूँ बने चढ़ लेतेंव..
मोरो मन होथे महूँ बने पढ़ लेतेंव!!

मोरो मन होथे महूँ बने पढ़ लेतेंव,
इस्कुल के डेरौठी मा महुँ बने चढ़ लेतेंव!!

  ✏श्रवण साहू
गांव-बरगा बेमेतरा (छ.ग.)
मोबा. +918085104647